Meeruth ke Zayeke
Meeruth ke Zayeke

Meeruth ke Zayeke

Abdel-oubaid

35 min
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मेरठ के जायके मेरठ की चाट काफी पहले से मशहूर है। 1965 से 1975 के बीच मेरठ शहर में लाला बाजार के निकट कागजी बाजार की ओर लच्छो जी नमकीन वालों की चाट की दुकान थी, जो बाद में जयभगवान उर्फ नन्हे जी ने संचालित की। नमकीन चाट ऐसी कि जो एक बार खाए , बार बार आए। दुकान पर गोलगप्पे, पालक के पत्तों की पकौड़ी, दालसेब, रस, टिक्की, आलू के लच्छे मिलाकर चाट बिका करती थी। पत्तों से बने बड़े बड़े दोनों में चाट के शौकीन दूर दूर से चाट खाने आते थे, दुकान के भीतर भी चाट खाने की व्यवस्था थी, जिस समय सामान्य ठेलों पर 10 पैसे में 2 टिक्कियां आती थी, उस समय लच्छो जी की दुकान पर अनेक नमकीनों से युक्त बड़ा दौना पचास पैसे का मिलता था। चाट के शौकीनों ने उस समय कुछ खास ठिकाने ढूंढ रखे थे। सुभाष बाजार पहले सिपट बाजार के नाम से विख्यात था। वहां अशोक की लाट के निकट सिंघवाल जी बैठते थे, छोटी सी मटकी में मसालेदार पानी साथ मे गोलगप्पे खिलाते थे। अपने दाएं बाएं छोटी छोटी बेंच डाली हुई थी, चारों ओर ग्राहकों को बिठाकर गोलगप्पे खिलाया करते थे। अब उनके परिवार की उस स्थल के आसपास दो दुकानें हैं। ऐसे ही एक ठिकाना अनाज मंडी में डीसीएम क्लॉथ हाउस के निकट हुआ करता था, जिस पर पहले टेना बैठा करते थे, उनके बाद में छिद्दा ने इस ठिकाने को संभाला। यह ठिकाना गोलगप्पे, टिक्की और पहले से ही तैयार किए गए समोसों के लिए प्रसिद्ध था। गाँव से शहर में खरीदारी करने वालों की यह प्रिय जगह थी। इस ठिकाने के दक्षिण में एक इमली का पेड़ हुआ करता था, जिसके नीचे सिन्धी जी मटर की चाट का खोमचा लगाया करते थे। चाट इतनी स्वादिष्ट होती थी, कि दूरदराज से लोग चाट खाने आया करते थे। अनाज मण्डी में प्याऊ के निकट बेगराम जी आलू की सब्जी की परात भरकर लाते थे। मजदूरी पेशा लोगों व दोपहर भोज के लिए घर से रोटी लाने वाले व्यापारियों के लिए यह दोपहर भोज में रोटी का साथ निभाया करती थी। ऐसे में मेरठ की गलियों में रेहड़ी लगाकर चाट व गोलगप्पे वालों की संख्या कम ही हुआ करती थी। मोहल्ले वाले अक्सर घरों में बैठकर ही ख़ास रेहड़ी वाले की प्रतीक्षा किया करते थे। खान पान के लिए प्रसिद्द मेरठ में व्यंजनों की विविधता कभी भी कम नहीं रही। 1970-75 के दौर में मोहल्ले में आलू पानी वाले आया करते थे। छोटी सी पोटली में बहुत छोटे छोटे उबले हुए आलू, जलजीरे की छोटी सी मटकी, एक छोटी मटकी में मीठी सोंठ हुआ करती थी। किसी भी घर के चबूतरे

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